दिल को छूने वाली बात कहते हैं हम, अगर आपको सही लगे तो शेयर करें। क्या मंदिर, मस्जिद और क्या गुरूद्वारे, बेजुबान पत्थर के बुत, कब्र है ये सारे। करोडो के गहने रुपए हीरे-जवाहरात, लोग दिल खोल कर इनको है चढ़ाते। उसी दहलीज पे दाने दाने को तरसते, नन्ने हाथ फैलाए जवा से बूढ़े हो जाते। सजे रहते हैं छप्पन भोग, मेवे, मिठाई, पत्थर की मूरत और चबूतरों के आगे। और इनके बाहर हर एक फ़कीर को, भूख से तड़प-तडप के मरते देखा है। लदी हुई हैं रेशमी चादरों से हरी मजारे पर बाहर, एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है। वो जो दे आते हैं लाखों रुपए जेवर, शिरडी और तिरूपति गुरूद्वारे में। उसको घर में हजार पांच सौ रूपये के लिए, काम वाली बाई को बदलते देखा है। सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई, सारी दुनिया का दर्द मिटाने को। आज उसी चर्च में बेटे की मार से बिलखते, सिसकते माँ – बाप को हमने देखा है। दिल से जलाती रही जो अखन्ड ज्योति, देसी घी की दिन रात की बनी पुजारन। आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण, एक-एक पल मौत से लड़ते देखा है। जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी, मां बाप के मरने के बाद पुरखों को पानी देते देखा है। आज लगाते हैं जो भंडारे शामियानों में, दरवाजे पे पड़े मां बाप को बिलखते देखा है। दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था जिस संग, अपनी लाडली बेटी को जबरन बाप ने। आज पिटते घसिटते बेइज्जत होते, उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है। मारा जाए वो पंडित बे मौत, सड़क दुर्घटना में यारो जो। मेरी हाथों की लकीरो का, भगवान बनके बैठा है। बन्द कर दिया पकड़ना सांपों को, सपेरे ने भी यह कहकर कि अब। अब इंसान ही इंसान को डसने का, काम सांपों से अच्छा करने लगा है। आत्म हत्या कर ली गिरगिट ने भी, ये सुसाइड नोट छोडकर कि अब। इंसान से ज्यादा रंग बिरंगे रंग तो, अब मैं भी नहीं बदल सकता हूं। गिद्ध भी चले गए उन्हें लगता है, इंसान हमसे ज्यादा अच्छा नोंचता है। जिस घर की एकता की मिसाल देता था जमाना, आज उसी आँगन में खिंचती दीवारों को देखा है।

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