बहती हुई नदी सी है ये मेरी जिंदगी, जो ना जाने कहां-कहां से बहकर जाती हूं। शहर-शहर गांव-गांव झाड़ियों और जंगलों से घूमती सागर से मिल जाती हूं। सागर की उठती लहरों के संग पवन के झोंकों सी आसमां को चूम आती हूं। आसमां के रंगों में रंग मेरा घुल मिल कर वरखा की वारिस बन जमीं पर आ जाती हूं। बहती हुई नदी सी है ये मेरी जिंदगी, जो ना जाने कहां-कहां से बहकर जाती हूं।

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