वो ना जाने किन किन निगाहों से रोज ही दो चार होती है, औरत तो ताउम्र ही औरों के लिए ग्लेमर का अखबार होती है। औरत माँ, बहिन, पत्नी, बेटी, बहू, और दोस्त बनकर, ना जाने कितने किरदारों की जिम्मेदारी दिल से निभाती है। ऑफिस ,घर, परिवार और बच्चों की सारी तकलीफें, चुप कर के सह जाती है उसे उफ़ तक ना करनी आती है। वो अपने ही घर में एक नींव का पत्थर हो जैसे, ऐसे सब दुख दर्द सहने की वो आदि हो जाती है। खामोशी की मुस्कान से आंखें बोला करती है, वो खुद बीमार होने के बाद भी सबकी चिंता करती हैं। अपने हिस्से का सारा सुख वो अपनों पर लुटाती है, इसी लिए औरत हमेशा त्याग की मूर्ति कहलाती है।
