छीन लिया मेरा बचपन कुछ हुस्न के ठेकेदारो ने बाजारों की रंगीन महफ़िलो में लाने वाले दलालों ने जब से लाया गया है हर रात हुस्न की नुमाइश होती है बोली लगाने वालों में समाज सेवी और पैसे वादी होते हैं इस दल-दल से निकलने की रोज मिन्नतें करतीं हूं फिर भी हर रात एक रात की नए मेहमान की दुल्हन बनती हूं काश पहले दिन ही कोई भईया या सईयां मिला होता तो मैं भी किसी इज्जतदार की बहन और बीवी होती यूं ना रोज रात की रंगीनियों में मैं नंगा नाच नाची होती ना जाने कितनो के द्वारा चूमे चूसे शरीर और चेहरे पर नकली हंसी की रोनक लेकर लोगों का दिल बहलाने वाली अन्दर से यूं ना मर मर कर मैं जियी और ना मरी होती जब झांकी मन झरोखों से दुनिया की भीड़ में तो मुझे मेरे गुनहगारों की लम्बी कतार नजर आती है गन्दी समाज के ठेकेदारों की भरमार नजर आती है रूठ गया मेरा बचपन और बिखर गई जवानी भी बुढ़ापे में सौ बीमारियां लेकर सड़ गई ये जिंदगानी भी ना कोई अपना मिला ना मिला कोई हमदर्दी देने वाला मिला तो इतना मिला भटकी हुई बहन बेटी और औरत का कोठों पर घुट घुट कर जीवन जीने का तजुर्बा मिला अपना घर और मां बाप जैसे भी हो उनके साथ जीवन बिताओ घर से भागने का ख्याल भी कभी ना अपने मन में लाओ

2 comments

  1. Ravi Kalra's avatar
    Ravi Kalra · July 15, 2020

    आप कमाल का लिखती हैं।बहुत शानदार

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