अब तक अब तक नहीं छेड़ा गया जिसको नगमों से भरा वो साज है तू जो साज में सोएं है नगमे उन नगमों की आवाज है तू जैसे कि हों जैसे कि हों एक मुंह बन्द कली जो फूल के सांचे में ना ढली नाज़ुक नाज़ुक कांटों में पली कुदरत का हसीं एजाज है तू वो नूर वो नूर जो है माथे पे तेरे वो नूर है चढ़ते सूरज का आंखों में चमक माहिनो की पहली सरेमाह का नाज है तू वो शेर है तू जो समझने से पहले ही दिल में उतर जाए जो सुनने से पहले ही तड़पा दे मौशिकी का वो गौदास है तू

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