Apna Apna

अकेलापन बांटा तेरा रात-रात भर जागकर
तुझे अपनाया मैंने अपना-अपना मान कर
और तुम मेरे ऊपर ही उंगलियां उठाने लगे
मुझे ही समाज की फ़ालतू औरत बताने लगे
जीवन भर साथ निभाने का लालच देकर
खुद ही अय्याशी के लिए आजमाने लगे अरे
तुमको क्या पता असहाय औरत की तकलीफों का
तुम लोगो को तो मज़ा लेना आता है रात की रंगीनियों का
औरत पास हो या दूर गरीब हो या हो मजबूर
छोटी हो या हो बड़ी या हों तुम्हारी मां की उम्र की
तुमको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है
तुम्हारे लिए हरेक औरत बीवी जैसा रिश्ता है
अरे सालों डूब मरो चुल्लू भर पानी में
तुम को मौत आ जाए भरी जवानी में
जो तुम उस खुदा से भी ना डरते हो
अपनी मां बहन बेटी पर गन्दी नज़र रखते हो
एक दिन कीड़े की तरह नाले में मरोगे तुम
अपने तो क्या अपनों की परक्षाई के लिए भी तरसोगे तुम

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